विज्ञापन जगत के दिग्गज, पीयूष पांडे,

ने अपनी सफलता और रचनात्मकता का श्रेय काफी हद तक अपने परिवार और विशेष रूप से अपने पिता को दिया है।

​पीयूष पांडे के पिता का नाम इन्द्र नारायण पांडे था।

​उनके पिता राजस्थान सरकार के सहकारी विभाग या राजस्थान स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक में कार्यरत थे।

​पीयूष पांडे के अनुसार, उनका घर एक ‘क्रिएटिव फैक्ट्री’ की तरह था, जहाँ कला और संस्कृति का माहौल था। उनके पिता एक सरकारी कर्मचारी होने के साथ-साथ कविता और रंगमंच में भी रुचि रखते थे।

​पिता इन्द्र नारायण पांडे की कुछ महत्वपूर्ण बातें, जिनका पीयूष पांडे पर गहरा असर हुआ:

  • कविता और वाकपटुता में प्रशिक्षण: उनके पिता को कविता बहुत पसंद थी और वह अक्सर घर में माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए कविताएँ गाते थे। पीयूष पांडे को छोटी उम्र से ही उनके पिता ने कविता पाठ (Elocution) के लिए तैयार किया। उनके पिता उन्हें सहज और सरल भाषा में बात करने की प्रेरणा देते थे।
  • सरलता पर ज़ोर: पीयूष पांडे बताते हैं कि उनके पिता ने उन्हें सिखाया कि किसी भी बात को दर्शकों के सम्मान के साथ, ऐसे संदर्भ में कहना चाहिए जिसे वे समझ सकें, और यह सरल, सहज तथा निडर होना चाहिए। विज्ञापन की दुनिया में उनकी ‘देसी’ और सरल कहानियाँ गढ़ने की कला का बीज उन्हें अपने पिता से ही मिला।
  • साहित्य और भाषा से प्रेम: उनके पिता ने ही उन्हें हिंदी साहित्य और भाषा से गहरा प्रेम सिखाया। अपनी आत्मकथा ‘पांडेमोनियम’ में उन्होंने अपने पिता के साथ हुई बातचीत और उनके किस्से साझा किए हैं, जिनसे उनकी रचनात्मकता को दिशा मिली।
  • खेल को समर्थन (और चेतावनी): पीयूष पांडे क्रिकेट के शौकीन थे और राजस्थान के लिए रणजी ट्रॉफी भी खेले। एक बार उनके पिता ने उनसे मज़ाक में कहा था, “इतना खेलते हो, जब रोटी कमानी होगी तो क्या बल्ले खाओगे?” इस बात ने उन्हें जीवन में कुछ स्थिर करने के लिए सोचने पर मजबूर किया, जिसके बाद वह विज्ञापन की दुनिया में आए।

​कुल मिलाकर, पीयूष पांडे के पिता एक मध्यवर्गीय सरकारी कर्मचारी थे जिन्होंने अपने नौ बच्चों (सात बेटियां और दो बेटे, जिनमें गायिका इला अरुण और फिल्म निर्देशक प्रसून पांडे भी शामिल हैं) को एक ऐसा रचनात्मक और सांस्कृतिक माहौल दिया, जिसने पीयूष पांडे को भारतीय विज्ञापन जगत का ‘पितामह’ बनने में मदद की।

By Dev

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